मंगलवार, 5 जनवरी 2010

nya sal -purana sanklap

बीते कल की है बात,३१ दिसंबर २००८ की रात .
बीती बिसार कर आगे की सुध ले रहे थे.
ये करना है,ये करेंगे,गांठ बांध रहे थे.
कुछ अपने,कुछ पराये मनसूबे बना रहे थे.
 काम वक्त पर करेंगे,घोषणा पत्र लागू किया.
सोम-सफाई,मंगल-धुलाई,बुध-पढाई का
सिलसिला जोरो से चालू किया.
महीनो की शुरुआत और विदाई का ,
कार्यक्रम तयशुदा चल रहा था .
हम खुश थे चलो अजेंडा ,
बराबर चल रहा था.
घंटे,दिन  और महीनो का
हिसाब सही चल रहा था.
फिर ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
जिन्दगी की गाड़ी की रफ्तार ,
कभी धीमी  तो कभी तेज हो पड़ी .
 कभी कभी तो ट्रेक बदलकर ,
दूसरी लाइन पर दूसरी ही ,
दिशा     पर चल पड़ी.
गंतव्य था किसी और ,
पहुंच गयी दुसरे ही ठोर.
भला हो इस अंग्रेजी चलन का ,
साल के अंत मे खुद को ,
टटोलते है ,सोचते है.
नया कुछ करने का संकल्प लेते है.
फिर एक बार खुद को बड़ी,
मासूमियत से धोका देते है.

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