नाम सीता का पाया तुमने ,रावन ने फिर हरण किया .
अग्नि परिच्छा देकर भी, न राम ने तुम्हारा वरणकिया .
नाम राधा का पाया तुमने ,क्रष्ण प्रेम की लगन लगी .
.मथुरा जाकर भूल गये वो ,विरह की फिर अगन जगी .
कभी शिला बनी तुम पत्थर की ,कभी चीर तुम्हारा हरण हुआ.
चुनवाई गई दीवारों में ,प्यार में इम्तहान खूब हुआ
युग बीते समय बदला, अपनी शक्ति पहचानो तुम .
और न रहना बन अबला ,दुर्गा का अवतार हो तुम.
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