रविवार, 31 मई 2009

वसुधेव कुटुंब

जाती ओर धरम के नाम पर ,
इंसानों ने इंसानों के बीच खीची चोडी खाई है ।
ए़क ओर जंहा आस्तित्व बनाये रहना मुस्किल है,
मुस्किले ओर क्यो बढाई है ।

आतंकबाद जाने कब से जहर उगल rहा,
आक्रोश भरा उफान जाने कितनी जिंदगिया लील रहा ।
है धर्मान्धता की पराकास्ठा,
इंसानियत का धर्म भुला बेठे।
लिए आत्मघाती तेवर अपना वजूद मिटा बेठे ।

अरे ओ मुर्ख इंसानों जरा अपना ईमान टटोलो ,
वहशी स्वार्थ की खातिर जिन्दगी ,
मौत में न बदलो ।
खुदा की बनाई दुनिया में ,
जहर के रंग न घोलो ।
वसुधेव कुटुंबकम की रख सोच ,
मन की आँखे तुम खोलो .

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